आर्य समय संवाददाता, जबलपुर। अद्वैत वेदांत को सभी भारतीय दार्शनिक प्रणालियों में पराकाष्ठा माना जाता है। उपनिषदिक कथनों का हवाला देते हुए, आचार्य शंकराचार्य ने चेतना और स्वयं की अवधारणाओं पर स्पष्ट रूप से प्रकाश डाला है। उनके अनुसार, आत्मा (आत्मा) या ब्रह्म (पारलौकिक स्व) में अविभाजित चेतना की प्रकृति है। निरपेक्ष, पारलौकिक सर्वोच्च आत्मा (चेतना) अनुभवजन्य ब्रह्मांड की नींव है, और सर्वोच्च, अनंत ब्रह्म आत्मा का सार है। अद्वैत का चिंतन ही भारतीय ज्ञान परंपरा का सबसे विषिष्ट पक्ष है। ये बात प्रो.अम्बिकादत्त शर्मा आचार्य एवं अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र विभाग डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) ने सोमवार को विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में आयोजित व्याख्यानमाला में मुख्य वक्ता के रूप में कही।
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय (आरडीयू) के दर्शनशास्त्र विभाग में सोमवार को स्वामी तारकेश्वरानन्द तीर्थ वेदांत व्याख्यान माला के द्वितीय व्याख्यान का आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा और आचार्य शंकर की अद्वैत दृष्टि विषय पर किया गया।
प्रारंभ में कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. भरत कुमार तिवारी ने कहा कि अद्वैत वेदांत के प्राचीन भारतीय ज्ञान और आदि शंकराचार्य के शास्त्रीय सिद्धांतों के संदर्भों को नई शैक्षणिक व्यवस्था में शामिल करना आवश्यक है क्योंकि बदलते सामाजिक परिवेश और भारतीय मूल्यों के बीच हमारी शिक्षा व्यवस्था को समावेशी बनाना अत्यावश्यक है। संकायाध्यक्ष कला संकाय एवं दर्शनशास्त्र विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. प्रियव्रत शुक्ल ने कहा कि वर्तमान षिक्षा व्यवस्था भारतीय प्राचीन ज्ञान परंपरा को लिए बिना नहीं चल सकती है, क्योंकि एक तरफ तो हम आधुनिकता के दौर में सरपट भागे जा रहे हैं, वहीं हमारी संस्कृति में निहित ज्ञान विज्ञान परंपरा को भूलते जा रहे हैं। अद्वैत वेदांत की अभेद दृष्टि, अनेकता में एकता की षिक्षा आज भी भारतीय संस्कृतिक के सातव्य को बनाये रखने में सक्षम और उपयोगी है।
हमारी शिक्षा व्यवस्था में हमारे भारतीय मूल्यों और ज्ञान की हो स्पष्ट झलक-
व्याख्यानमाला कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अधिष्ठाता महाविद्यालयीन विकास परिषद् एवं वरिष्ठ आचार्य डॉ. राकेश बाजपेयी ने कहा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में हमारे भारतीय मूल्यों और ज्ञान की स्पष्ट झलक दिखाई दे सके। इसी अनुक्रम में म.प्र. शासन उच्च षिक्षा विभाग के आदेशानुसार कुलगुरू प्रो. राजेश कुमार वर्मा के संरक्षण में विश्वविद्यालय ‘भारतीय ज्ञान परंपरा एवं राष्ट्रीय षिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में भौतिक विज्ञान’ विषय को लेकर निरंतर प्रयासरत है। आयोजन के सारस्वत अतिथि प्रो. श्रीकांत मिश्र, आचार्य एवं अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र विभाग अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा ने कहा कि भारत में वैदिक ज्ञान की जड़े बहुत गहरी हैं। वे जनमानस की चेतना में हैं और उसके रक्त में प्रवाहमान हैं। विषिष्ट अतिथि डॉ. एचएन सिंह, रीवा ने कहा कि शास्त्रों से इस आत्मज्ञान को अर्जित करने के लिए गुरु आवश्यक है क्योंकि शास्त्र एक दर्पण की तरह है। जिसमें हम अपना ही प्रतिबिंब देख पाते हैं। गुरु की दृष्टि सदा निरपेक्ष होती है। मोक्ष केवल वेदान्त को समझ पाने एवं आत्मसात कर पाने से ही सम्भव है। व्याख्यानमाला का संचालन विभाग की डॉ. रश्मि पटेल एवं आभार प्रदर्शन डॉ. तेजराम पाल ने किया। अंत में शांतिपाठ डॉ. रीना मिश्रा ने किया। इस अवसर पर डॉ. राजेश कुमार पाण्डेय, डॉ. राकेश गोस्वामी, डॉ. वंदना यादव, डॉ. वर्षा अवस्थी, पवन पाण्डेय, शशांक मिश्रा, निषांत मलिक, प्रीति सहित सभी विद्यार्थी एवं अन्य गणमान्यजन मौजद रहे।

Continue With Google
Comments (0)