आर्य समय संवाददाता, जबलपुर। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) जबलपुर इकाई ने मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के कुलगुरु प्रोफेसर राजेश कुमार वर्मा की नियुक्ति में नियमों और आवश्यक योग्यता की अनदेखी का आरोप लगाया है। वहीं प्रो राजेश कुमार वर्मा एवं अन्य शासकीय विश्वविद्यालयों के कुलगुरुओं की नियुक्ति की उच्च स्तरीय जांच की मांग की।
एन एस यू आई अध्यक्ष सचिन रजक ने बताया कि रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर के वर्तमान कुलगुरु प्रोफेसर राजेश कुमार वर्मा की मूल पद अर्थात प्राध्यापक पद पर नियुक्ति में स्पष्ट विसंगतियाँ देखने को मिलती हैं। उन्हें<iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/eO06_rI1KrQ" width="640" height="360" class="note-video-clip"></iframe> पीएचडी उपाधि 25 नवंबर 2008 को प्रदान की गई थी और इसके बाद 19 जनवरी 2009 को मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत प्राध्यापक पद पर नियुक्ति के लिए रोजगार और निर्माण में विज्ञापन जारी किया।
इस विज्ञापन में प्राध्यापक पद (प्रथम श्रेणी) के लिए दो आवश्यक योग्यताएँ अनिवार्य की गई थीं:
1. संबंधित विषय में पीएचडी उपाधि।
2. दस वर्षों का अध्यापन अनुभव।
इसके अनुसार, प्राध्यापक पद हेतु आवश्यक न्यूनतम योग्यता में पीएचडी उपाधि के उपरांत दस वर्षों का अध्यापन अनुभव होना अनिवार्य था। यह भी स्पष्ट किया गया था कि आवेदकों के पास यह अनुभव और योग्यता विज्ञापन की अंतिम तिथी, यानी 20 फरवरी 2009 तक होनी चाहिए।
चूंकि प्रोफेसर राजेश कुमार वर्मा ने 2008 में अपनी पीएचडी पूरी की और जनवरी 2009 में आयोग द्वारा विज्ञापन जारी किया गया, इससे यह स्पष्ट होता है कि विज्ञापन की तिथि तक उनके पास आवश्यक अनुभव नहीं था। इसके बावजूद उन्हें नियमों की अवहेलना करते हुए सीधे प्राध्यापक पद पर नियुक्ति दी गई। इस संदर्भ में विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले मौजूद हैं, जो स्पष्ट करते हैं कि आवश्यक अनुभव की गणना अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता प्राप्त करने के पश्चात से की जानी चाहिए, न कि उसके पहले।
सचिन रजक ने कहा कि प्रश्न यह है कि प्रो राजेश कुमार वर्मा एवं इसी तरह से नियुक्ति हासिल करने वाले अन्य कुलगुरुओं की नियुक्ति ही जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के विपरीत हुई है, तो वे प्रदेश के विश्वविद्यालयों का संचालन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के अनुसार कैसे कर पाएंगे? हम यह मांग करते हैं कि शासकीय विश्वविद्यालयों के कुलगुरुओं की नियुक्तियों की भी जांच की जाए और शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए। उच्च शिक्षण संस्थानों में नियमों की अवहेलना के कारण विद्यार्थियों का भविष्य और राज्य की शिक्षा व्यवस्था की साख दोनों प्रभावित हो रही हैं, जिसे तत्काल सुधार की आवश्यकता है।

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