आर्य समय संवाददाता, जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय (आरडीयू) में ऑन लाइन उपस्थिति दर्ज कराने बायोमैट्रिक मशीनें लगाए जाने के बाद भी कर्मचारी अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे हैं। बायोमैट्रिक मशीन में उपस्थिति दर्ज कराने के बाद गायब हो जाते हैं। कुलगुरू खुद जमीनी हकीकत से परिचित हैं, क्योंकि पिछले दिनों उनके बंगले की सुरक्षा में पदस्थ कर्मचारी ही गायब हो गए थे। अब सवाल यह उठ रहा है कि बंगले से गायब रहने वाले कर्मचारियों पर जब कुलगुरू ने इतनी सख्त कार्रवाई की है तो विश्वविद्यालय से गायब रहने वालों का क्या होगा।

दरअसल,अपने कार्यो को लेकर विश्वविद्यालय से संबंध पांच जिलों के छात्र-छात्राएं आते हैं। लेकिन उन्हें संबंधित कर्मचारी कभी भी अपनी निर्धारित कुर्सी में नहीं मिलते हैं। जिसके चलते दुरदराज के क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थी विश्वविद्यालय में सक्रिय दलालों के चंगुल में फंस जाते हैं। अब कुलगुरू डॉ. राजेश वर्मा ने जिस तरह बंगले से गायब रहने वाले श्रमिकों को हटाने व शेष कर्मचारियों को नोटिस थमाया है। उससे एक आश जागी है कि विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन से गायब रहने वालों पर भी ऐसी ही गाज गिरेंगी। बंगले की कार्रवाई को महज कुलगुरू का संकेत बताया जा रहा है।

एक कार्रवाई ने कर्मचारी नेताओं को आपस में उलझाया -
कुलगुरू की एक कार्रवाई ने विश्वविद्यालय के कर्मचारी नेताओं को आपस में उलक्षा दिया है। इसे कुलगुरू का मास्टर स्टोक भी कहा जा सकता है। सूत्रों की माने तो कुलगुरू बंगले की सुरक्षा में तैनात श्रमिकों में एक पूर्व कर्मचारी संघ अध्यक्ष बंश बहोर पटैल का भांजा है। वहीं एक पूर्व कर्मचारी श्याम बिड़ला का रिश्तेदार है। दो ही श्रमिकों को कुलगुरू ने विश्वविद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अब विश्वविद्यालय में कर्मचारियों के दो गुट कार्रवाई के पीछे एक दूसरे का हाथ बता रहे हैं। वहीं अब अगर कुलगुरू किसी और कर्मचारी नेता के रिश्तेदार पर कार्रवाई करेंगे तो पहले से पीड़ित पक्ष ताली बजाएगा। बात साफ है कि कर्मचारी नेता अब आपस में ही उलझे रहेंगे।

लापरवाह श्रमिकों को दिखाया जाएगा बाहर का रास्ता-
विश्वविद्यालय में करीब 85 श्रमिक दैनिक वेतन पर कार्य कर रहे हैं। जिसमें से करीब आधा दर्जन कुलगुरू बंगले की सुरक्षा, इसी प्रकार रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारियों की सुरक्षा में तैनात किए जाते हैं। सबसे मजे की बात तो यह कि बंगलों में तैनात होने वालो के मुकाबले आधे श्रमिकों को प्रशासनिक भवन व अन्य स्थानों पर तैनात किया जाता है। उक्त श्रमिकों में लगभग सभी कर्मचारियों के रिश्तेदार हैं। कुलगुरू से जिस तरह से दो लापरवाह श्रमिकों को बाहर का रास्ता दिखाया है। उससे शेष पर कार्रवाई करने का रास्ता साफ हो गया है, वैसे भी विश्वविद्यालय के नियमित सुरक्षा कर्मचारी और भृत्य तो कार्यालयों में बाबू गिरी कर रहे हैं। अगर उन्हें उनके मूल पद पर भेज दिया जाए तो समस्या का बेहतर हल हो जाएगा।