छत्तीसगढ़ के खजुराहो भोरमदेव मंदिर अतिप्राचीन मंदिरों मे एक है,कई रहस्य आज भी छुपे हुये है,एक हजार साल से भी अधिक पुराने इस मंदिर का भव्यता आज भी बरकरार है,मैकल श्रेणी पर्वत के बीचोबीच विराजमान भोरमदेव मंदिर अपने कलाकृतियों के साथ कई रोमांचक इतिहास भी समेटे हुये है...मंदिर के उपर कलश नही होने का रहस्य आज भी लोगों के बीच महज भ्रांतियां है,जानकारो की माने तो भोरमदेव मंदिर मे अन्य मंदिरों की तरह यहा कलश था।
दरअसल भोरमदेव मंदिर मे कलश नही होने की जो भ्रांतियां थी वह गलत साबित हो रहा है हालंकि इतिहासकार बताते है भोरमदेव मंदिर का निर्माण लगभग 1089 ई.मे फणीनागवंशी राजाओं के द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया तब मंदिर मे स्वर्ग जणित कलश होने का दावा भी किया जाता रहा है चुकी भोरमदेव मंदिर के दक्षिण दिवार पर एक शिलालेख है जिसमे कलश होने का उल्लेख भी होने का दावा किया जा रहा है ,शिलालेख मे देवनागरी लिपि मे लिखे इस मंदिर के कई रोचक इतिहास को उजगार करता है,हीरे-मोती व स्वर्ण जढ़ित कलश होने का पुख्ता सबूत भी शिलालेख को माना जाता है,वही 1551 ई.को माडवपति शाह नाम के राजा और रतनपुर के महाराजा बाहूराय ने राज्य जीतने के बाद मंदिर के कलश को संगमेश्वर नामक स्थान पर ले गये थे चूकि उस समय राजाओं को किसी राज्य को जीतने के बाद प्रतीक के स्वरूप मंदिरों का कलश को जीतने का चिन्ह मानते थे इसलिए भोरमदेव मंदिर के कलश को अपने साथ ले गये थे,साथ ही यह भी उल्लेख की बाद मे दादूजी नामक राजा ने उस कलश वापस लाया था लेकिन उस कलश को कहा रखा है उस शिलालेख मे उल्लेख नही होने की बाते भी कही जाती है,इतिहासकार मानते है अगर भोरमदेव मंदिर इतिहास पर अच्छे से काम किया जाता तो और भी ऐतिहासिक तथ्य भी उजागर हो सकते है।
भोरमदेव मंदिर प्राचीन मान्यता के आधार पर पहले 6 महिने का रात और 6 महिने का दिन होता था ,भोरमदेव मंदिर के शिल्पियों को एक ही रात मे मंदिर को पूर्ण करने का आदेश दिया था परन्तु 6 माह पूर्ण होते -होते सूर्योदय हो गया था जिसके कारण मंदिर के शिखर मे कलश चढ़ाना शेष रह गया था इसलिए भोरमदेव मंदिर मे कलश नही होने की बाते कही जाती है,हालंकि इतिहासकारो की माने तो भोरमदेव मंदिर मे स्वर्ण जढ़ित कलश होने का दावा किया जाता रहा है।

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