भाजपा नेतृत्व और प्रदेश के नेताओं के हाल देखते हुए रहीम
का यह दोहा संगठन और उनके कर्ताधर्ताओं पर सटीक बैठता है ।
"अब रहीम मुसकिल परी,
गाढ़े दोउ काम
सांचे से तो जग नही,
झूठे मिले ना राम"
मध्य प्रदेश भाजपा में लगभग 8 साल से संघ और भाजपा के स्थापित नेताओं के बीच अजीब किस्म
का द्वंद चल रहा है । संघ और भाजपा के शुभचिंतक और जानकार इस शीत युद्ध से लंबे
समय से चिंतित नजर आते हैं लेकिन इससे बचाव का भी कोई फार्मूला चुनाव की बेला आते-आते खोज नही पाए।
भविष्य इस बात का लेखा-जोखा जरूर करेगा कि आखिर
मप्र जैसे मजबूत संगठन वाले राज्य
की यह दुर्गति क्यों हुई ? हालात इस कदर निराशजनक हुए कि केंद्रीय
गृहमंत्री अमित शाह जो कि चाणक्य माने जाते हैं उन्हें 20 दिन में तीन बार उनको मध्य प्रदेश का दौरा करना पड़ा। एक
स्थानीय नेता की भांति उन्हें कार्यकर्ताओं से बातचीत करने के साथ चुनाव से पहले
सभाएं तक करनी पड़ रही है। यह दोनों नेतृत्व पर अधिकार और कब्जे को लेकर भी है।
साथ ही सरकार में किसका हुकुम सबसे ज्यादा बजाया और सुनाया जाएगा इसकी भी
प्रतिस्पर्धा है। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को प्रदेश चुनाव प्रबंध समिति
के संयोजक को बनाने के बाद मैराथन बैठकों का जो दौर शुरू हुआ था उसके नतीजे आने
शुरू हो गए हैं। इसमें उन्होंने इन कमेटियों का गठन किया है उसमें चुनाव के लिहाज
से जिलों के टेस्टेड नेताओं को प्रभारी के रूप में कमान सौंपी है ताकि जो
जिलाध्यक्ष है उनकी भी बेकद्री ना हो और संगठन में चुनाव जिताऊ पुराने कार्यकर्ता
भी उपेक्षित ना रहें। कुल मिलाकर इसे संघ परिवार के इक्का - दुक्का नेताओं बाल हठ
से बने हालात में दो पाटन के बीच पार्टी को पिसने से बचाने के प्रयास के रूप में
देखा, माना और समझा जा रहा है।
केंद्रीय मंत्री तोमर को पार्टी में मध्यमार्ग अपनाने में सिद्धहस्त माना जाता है।
इसलिए अपेक्षा की जा रही है प्रदेश में वेंटिलेटर आई पार्टी को दौड़ाने की कोशिश सब
को ही मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जा रही है। काम कठिन है। यह बात केंद्रीय
नेतृत्व को इसलिए भी समझ मे आ रही होगी कि पार्टी का कार्यकर्ता निराशा में आने के
बाद घर बैठने और दोषी नेताओं को घर बैठाने का मन बना चुका है। दिल्ली में भाजपा ने
एक बार किरण बेदी को कार्यकर्ताओं की मर्जी के विपरीत डॉ हर्षवर्धन को दरकिनार कर
मैदान में उतारा था लेकिन कार्यकर्ताओं ने हम उसी से उसका उत्तर दिया परिणाम
स्वरूप पार्टी को सत्ता से बाहर जाना पड़ा। इसके बाद दिल्ली में भाजपा पीएम
नरेंद्र मोदी के रोड शो करने के बाद भी सरकार में वापसी नही कर पाई। जबकि दिल्ली
में भाजपा बहुत मजबूत मानी जाती थी।
बहराल भाजपा नरेंद्र सिंह तोमर और शिवराज सिंह चौहान की
जुगलबंदी के साथ प्रदेश में फिर चुनावी जंग जीतना चाहती है। इसके रुझान आने भी लगे
हैं लेकिन अभी सबको साधने के साथ संबंध है और जिससे जो वादा किया है उसे पूरा करने
की लाइन पर काम करना होगा पिछले 10 सालों में भाजपा कार्यकर्ताओं का नेताओं के
वादों से विश्वास टूटा है। विश्वास और अविश्वास की खाई को पाटना एक बड़ा काम हुआ
सफलता इसी पर ज्यादा निर्भर करेगी।
भारतीय जनता पार्टी के जो 57 जिले हैं उसमें जिलों का प्रभार जिन लोगों को सौंपा है
उसमें 90 फीसद कार्यकर्ता शिवराज
सिंह चौहान,नरेंद्र सिंह तोमर,कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल से जुड़े हुए हैं। इनमें खास बात यह है कि
अधिकांश पूर्व में जिला अध्यक्ष का दायित्व भी निभा चुके हैं। इसलिए जिलों से मंडल
स्तर के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में मदद मिलने की उम्मीद पार्टी में की जा
रही है। दो-तीन जगह बीमार और उम्रदराज नेताओं को यह कार्य सौंपा है । इसका अर्थ यह
कि दवाब या फिर कार्यकर्ताओं के बारे में नेताओं को जानकारी नहीं है।
इसके अलावा जो चुनाव समितियां बनी हैं उनमें 102 नेताओं में सिर्फ एक महिला प्रतिनिधि का होना
यह बता रहा है कि प्रदेश भाजपा के नेतृत्व
में महिला नेताओं की कमी है या उनकी उपेक्षा की जा रही है ।
चुनाव प्रबंधन के हिसाब से अभी बहुत सी कमेटियां बनाई जाने
वाली और जो बन चुकी है उनमें संशोधन के साथ विस्तार भी संभव है इसलिए गलतियों को
सुधारने के लिए दरवाजे खुले रखे गए हैं। साथ ही कांग्रेस के मुकाबले भाजपा अपने
पुराने कार्यकर्ताओं को पुनः जोड़ने उन्हें सक्रिय करने और नए कार्यकर्ताओं के साथ
तालमेल करने का काम जल्दी शुरू करने वाली है। कुल मिलाकर चुनौती यह है कि रायता भी
सिमट जाए और फैलाने वाले भी नाराज न हो...

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