निरंतर विस्तारित होते सडक़ मार्गों से आवागमन सुगम हो रहा है। अमेरिका के बाद भारत में दूसरा सबसे बड़ा सडक़ों का जाल है। इन सबके बावजूद, सडक़ हादसों में हो रही बढ़ोतरी और मौत का आंकड़ा डराने वाला है। ऐसे हादसों में मरने वाले लोगों में अधिसंख्य 25 से 34 साल के युवा है, जिनका आंकड़ा लगभग 70 प्रतिशत है। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर हुए विश्लेषण से न सिर्फ चौंकाने वाला अपितु सदमे में डालने वाला आंकड़ा सामने आया। एक क्षेत्र विशेष में बीते 10 माह में 95 लोगों की जान चली गई। तथ्य यह भी है कि वैश्विक स्तर पर सडक़ हादसों एवं मृत्यु में गिरावट हो रही है। लेकिन, भारत में सडक़ दुर्घटनाएं 12 प्रतिशत, उनसे हो रही मृत्यु 10 प्रतिशत और चोट लगने या घायल होने की घटनाएं 15 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही हैं। किसी युवा की असामयिक मृत्यु जहां परिवार को छिन्न-भिन्न कर देती है, वहीं राष्ट्र निर्माण की राह में भी बाधा उत्पन्न होती है। हर वर्ष सडक़ सुरक्षा सप्ताह और सडक़ सुरक्षा माह मनाने के बावजूद हादसों में कमी नहीं हो रही।

सडक़ों के विकास और द्रुत परिवहन के लिए अनेकानेक परियोजनाएं चल रही हैं। सडक़ परिवहन मंत्रालय की और से जारी प्रतिवेदन में एक अन्य तथ्य गौर करने लायक है, वह यह कि कुल सडक़ हादसों में से एक तिहाई राष्ट्रीय उच्च मार्ग एवं दुरुतमार्ग पर होते हैं। लगभग आधे हादसे राज्यों के उच्च मार्गों को छोडकऱ अन्य मार्गों पर होते हैं। ये अन्य मार्ग अधिकांशतया शहरी सडक़ परिवहन के लिए होते हैं। यदि इनमें होने वाली दुर्घटना मृत्यु को देखें तो उच्च एवं दुरुतमार्गों पर लगभग 35 प्रतिशत मौतें होती हैं। दिल्ली सडक़ दुर्घटनाओं में सबसे अव्वल है। राज्यों में तमिलनाडु शीर्ष पर है।

आमतौर पर नीतिगत चर्चाओं से लेकर आमजन तक की चर्चा में बढ़ते परिवहन संकट के लिए वाहनों की संख्या को दोषी ठहराया जाता है, लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। विश्व के दूसरे सबसे बड़े सडक़ नेटवर्क वाले राष्ट्र में पूरी दुनिया के मात्र 1 प्रतिशत वाहन हैं और हादसे 6 प्रतिशत। वाहनों के कारण हादसों की शिकायत हर कोई करता है लेकिन उसके मूल में जाकर परिवर्तन का सार्थक प्रयास नहीं होता। ज्ञान तो बांट दिया जाता है कि ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए लेकिन भागमभाग और सबसे अव्वल रहने की कोशिश में स्वयं का विश्लेषण ही नहीं कर पाते। यथार्थ तो यह है कि हादसों के लिए वाहन नहीं अव्यवस्थित यातायात दोषी है। हाल ही प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, ट्रैफिक जाम के दौरान व्यक्ति का तनाव एवं रक्तचाप स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है। यदि अध्ययन किया जाए तो उभर कर आएगा कि सडक़ सुरक्षा कानून की सर्वाधिक अवहेलना भी हमारे यहां ही होती है। आमतौर पर ट्रैफिक पुलिस को सबसे भ्रष्ट करार दे दिया जाता है, लेकिन इस बात की अनदेखी की जाती है कि नियम की अवहेलना हुई थी। यह विचार करना होगा कि चालक को लाइसेंस जारी करने से पहले नियमों संबंधी संपूर्ण ज्ञान हो जाए। सिर्फ परिवहन कार्यालय में अंग्रेजी का 8 बनाकर परीक्षा लेने से काम नहीं चलने वाला। प्राय: सभी शहरों में यातायात के सिग्नल, हेलमेट, लेन परिचालन, सीट बेल्ट आदि की खुली अवहेलना होती है। जोश तो इतना रहता है कि यदि सडक़ चौड़ी है तो उस पर हर तरफ से वाहन चलाने की खुली छूट समझ ली जाती है। कोई अनपढ़ या अज्ञानी नियम विरुद्ध या निरंकुश रूप से गलत तरीके से वाहन चलाए तो समझ में आता है। हकीकत यह है कि ज्यादातर मामलों में नियम-कानूनों की अवहेलना करने वाले युवा होते हैं और इनमें भी अधिसंख्य अच्छे पढ़े-लिखे होते हैं। सवाल यह है कि ये युवा राष्ट्र को किस दिशा में लेकर जाने का सपना रखते हैं? अपेक्षा यह रहती है कि हर चौराहे पर पुलिस की तैनाती हो लेकिन न तो यह संभव है और न ही अपेक्षित। स्वानुशासन पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? हालत यह है कि राष्ट्र के गौरव रूप में स्थापित दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर 30 किलोमीटर के दायरे में लगाई गई बत्तियां, ब्लिंकर्स और मार्कर चुरा लिए जाते हैं। इनके बिना सुगम यातायात बेहद मुश्किल हो जाता है। हम बात करते हैं पश्चिमी देशों अथवा जापान, सिंगापुर जैसे एशियाई राष्ट्रों की यातायात व्यवस्था की लेकिन व्यवहार उसके अनुरूप नहीं करते। बढ़ते हादसों के लिए शहरों का अव्यवस्थित विकास भी जिम्मेदार है। विकसित हो रहे शहरों में पैदल या साइकिल पर चलने के लिए सुरक्षित जगह ही नहीं बची। ऐसे हालात में दिव्यांग तो सडक़ों पर चलने की कल्पना ही नहीं कर सकते। सरकारें सर्वस्पर्शी, गरीबोन्मुखी, निम्नतम तबके के लिए कार्य करने का दावा करती हैं लेकिन वास्तविकता में ऐसा कुछ नजर नहीं आता। शहरों में विकसित बड़ी और चौड़ी सडक़ों पर भी वाहनों की पार्किंग नजर आती है। शहरों की अनेकानेक कमियों के बारे में न्यायालय संज्ञान लेकर कार्रवाई के निर्देश भी देते हैं, लेकिन हालात नहीं सुधारते। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। विडंबना तो यह है कि नगर नियोजन के लिए जिम्मेदार मानचित्र का अनुमोदन करते वक्त उसके ट्रैफिक भार का विश्लेषण नहीं करते। तभी तो कहीं भी रेस्टोरेंट, बैंक्वेट हॉल, अस्पताल, दुकानें, शोरूम आदि को अनुमति प्रदान कर जाती है और खमियाजा जनता को उठाना पड़ता है।हालत यह है कि सडक़ों के आधे से अधिक हिस्से पर वाहन पार्क रहते हैं। ऐसी स्थिति में जाम तो लगेगा ही, हादसों से भी नहीं बचा जा सकता। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण भी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा। गुजरात में सार्वजनिक परिवहन में बीआरटीएस तथा मुख्य सडक़ों पर नियंत्रण के चलते हालात में सुधार हुआ है। जाहिर है बेहतर नियोजन, नियम-कानूनों का सख्ती से पालन करवाकर सडक़ हादसों को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। सडक़ों का विकास निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन इसके समानांतर रूप से सडक़ सुरक्षा, यातायात व्यवस्था, निर्माण पद्धति, डिजाइन इत्यादि पर भी समग्रता के साथ कार्य होना चाहिए। अन्