समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन ने सांसदों के निलंबन पर चिंता व्यक्त किया और इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया। वह राज्यसभा में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के सामने चिल्लाती नजर आईं।
बुधवार को संसद के दोनों संदनों में बीते सप्ताह लोकसभा की सुरक्षा में हुई चूक और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री के मुद्दे पर हंगामे की वजह से कामकाज ठप रहा। इसी बीच सपा की सांसद जया बच्चन का बयान आया है। उन्होंने कहा कि आज सुबह से ही सभापति किसी की बात नहीं सुन रहे हैं और चिल्लाए जा रहे हैं। वो अपनी बात रखने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनकी बात कोई सुन नही रहा है।
समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन ने सांसदों के निलंबन पर चिंता व्यक्त कीं और इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया। वह राज्यसभा में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के सामने चिल्लाती नजर आईं। जया बच्चन लगातार उपराष्ट्रपति धनखड़ का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही थीं और उन्हें उच्च सदन में "सर, सर..." चिल्लाते देखा जा सकता था। बाद में एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'मैं लगातार चिल्ला रही थी और बोलने की इजाजत मांग रही थी। फिर मैंने कहा, मैं आपको सर कह रही हूं लेकिन आप जवाब नहीं दे रहे हैं। अब मै आपको मैडम कहूंगी।”
राज्यसभा स्पीकर जगदीप धनखड़ ने आज सुबह सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक ट्वीट किया। उन्होंने ट्वीट में कहा, 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का टेलीफोन आया। उन्होंने कुछ सांसदों की कल संसद परिसर में घृणित नौटंकी पर बहुत दुख व्यक्त किया है। उन्होंने मुझे बताया कि वह पिछले बीस वर्षों से इस तरह के अपमान सहते आ रहे हैं, लेकिन यह तथ्य कि भारत के उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद के साथ और वह भी संसद में, ऐसा हो सकता है, दुर्भाग्यपूर्ण है। मैंने उनसे कहा- प्रधानमंत्री, कुछ लोगों की हरकतें मुझे रोक नहीं पाएंगी। मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूं और हमारे संविधान में निहित सिद्धांतों को कायम रख रहा हूं। मैं अपने दिल की गहराई से उन मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध हूं। कोई भी अपमान मेरा रास्ता नहीं बदल सकता।"
इनके अलावा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी उपराष्ट्रपति के मजाक पर खेद व्यक्त किया है। उन्होंने एक्स पर ट्वीट करते हुए कहा, "जिस तरह से हमारे सम्मानित उपराष्ट्रपति को संसद परिसर में अपमानित किया गया, उसे देखकर मुझे निराशा हुई। निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र होना चाहिए, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति की गरिमा और शिष्टाचार के मानदंडों के भीतर होनी चाहिए। यह संसदीय परंपरा रही है जिस पर हमें गर्व है और भारत के लोग उनसे इसे कायम रखने की उम्मीद करते हैं।"

Continue With Google
Comments (0)