आर्य समय संवाददाता,जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ( RDVV) के 36वें दीक्षांत समारोह से पहले गुरुवार को आयोजित रिहर्सल में उस समय हंगामे की स्थिति निर्मित हो गई जब गोल्ड मेडलिस्ट को पता चला कि महज 20 चयनित बच्चों को ही राष्ट्रपति के हाथों गोल्ड मेडल मिलेगा।
वहीं शेष लगभग 220 स्वर्ण पदकधारी, पीएचडी, डी.लिट. एवं डीएससी उपाधिधारी स्कॉलर्स केवल अपने निर्धारित स्थान पर खड़े होकर राष्ट्रपति का अभिवादन करेंगे।
यह जानकारी सामने आते ही प्रेक्षागृह में उपस्थित विद्यार्थियों में गहरा असंतोष फैल गया और देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया।
उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा 18, 19 एवं 20 जून को सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक रिहर्सल का कार्यक्रम निर्धारित किया गया था। इसके लिए देश के विभिन्न राज्यों तथा विदेशों से भी अनेक शोधार्थी एवं स्वर्ण पदकधारी जबलपुर पहुंचे हैं। सभी प्रतिभागियों ने दीक्षांत समारोह में शामिल होने के लिए निर्धारित पंजीयन शुल्क भी जमा कराया था। अधिकांश विद्यार्थियों की अपेक्षा थी कि उन्हें अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण शैक्षणिक उपलब्धि—डॉक्टरेट, डी.लिट., डीएससी अथवा स्वर्ण पदक— राष्ट्रपति अथवा प्रोटोकॉल के अनुसार राज्यपाल के कर-कमलों से प्राप्त होगी। लेकिन रिहर्सल के दौरान दीक्षांत समारोह के प्रभारी प्रो. एस.एस. संधू एवं प्रो. राकेश वाजपेयी द्वारा यह जानकारी दिए जाने के बाद कि मंच पर केवल 20 चयनित विद्यार्थियों को ही सम्मानित किया जाएगा, वातावरण पूरी तरह बदल गया।
विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से पूछा कि जब सभी स्वर्ण पदकधारी अपने-अपने विषयों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर समान उपलब्धि हासिल कर चुके हैं, तब केवल कुछ विद्यार्थियों का चयन किस आधार पर किया गया। उनका आरोप था कि चयन प्रक्रिया का कोई मानदंड सार्वजनिक नहीं किया गया और न ही इसकी पूर्व सूचना विश्वविद्यालय की वेबसाइट अथवा किसी आधिकारिक माध्यम से दी गई। विद्यार्थियों ने कहा कि यदि यह जानकारी पहले उपलब्ध करा दी जाती तो अनेक शोधार्थी हजारों किलोमीटर की यात्रा कर केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराने नहीं आते।
स्थिति धीरे-धीरे तनावपूर्ण हो गई और प्रेक्षागृह में उपस्थित विद्यार्थियों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। इस दौरान कुछ शोधार्थियों और विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों के बीच तीखी बहस भी हुई। इसके बाद बड़ी संख्या में स्कॉलर्स एकत्र होकर कुलगुरु कार्यालय पहुंच गए और समान न्याय तथा पारदर्शिता की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। विद्यार्थियों का कहना था कि यह केवल सम्मान का नहीं बल्कि समान अधिकार और गरिमा का प्रश्न है। यदि सभी को राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित करना संभव नहीं है तो कम से कम शेष विद्यार्थियों को राज्यपाल द्वारा उपाधि एवं पदक प्रदान किए जाएं।
विरोध के दौरान छात्रों ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें वास्तविक व्यवस्था से अनभिज्ञ रखकर रिहर्सल के लिए बुलाया। यदि अधिकांश विद्यार्थियों को मंच तक बुलाया ही नहीं जाना था, तो इसकी जानकारी पहले ही सार्वजनिक की जानी चाहिए थी। उन्होंने मांग की कि विश्वविद्यालय तत्काल अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर स्पष्ट सूचना जारी करे कि किन विद्यार्थियों को मंच पर सम्मानित किया जाएगा तथा शेष विद्यार्थियों के लिए क्या व्यवस्था रहेगी।
इसी दौरान कुलगुरु कार्यालय के बाहर एक और विवाद उत्पन्न हो गया। विद्यार्थियों का आरोप है कि विश्वविद्यालय के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने वहां उपस्थित छात्राओं को हटाने के दौरान उनके साथ अभद्र व्यवहार किया तथा ऊंची आवाज में अनुचित भाषा का प्रयोग किया। इस घटना पर छात्राओं एवं अन्य विद्यार्थियों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और संबंधित कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की।
काफी देर तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद कुलगुरु विश्वविद्यालय पहुंचे और कुछ छात्राओं एवं प्रतिनिधि विद्यार्थियों को चर्चा के लिए अपने कक्ष में बुलाया। बैठक में विद्यार्थियों ने स्पष्ट कहा कि विश्वविद्यालय की वर्षों पुरानी गरिमामयी परंपरा को बनाए रखा जाना चाहिए तथा समान उपलब्धि रखने वाले सभी विद्यार्थियों के साथ एक समान व्यवहार किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि यदि दीक्षांत समारोह में उपाधियों और स्वर्ण पदकों का विधिवत वितरण ही नहीं होगा तो ऐसे आयोजन की मूल भावना समाप्त हो जाएगी।
विरोध के दौरान स्वर्ण पदकधारियों एवं शोधार्थियों ने संयुक्त रूप से जिला दण्डाधिकारी एवं कुलगुरु के नाम विस्तृत ज्ञापन भी सौंपा। ज्ञापन में कहा गया कि केवल 20 विद्यार्थियों का चयन कर शेष स्वर्ण पदकधारियों को मंचीय सम्मान से वंचित करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के सिद्धांत की भावना के विपरीत है।
इस विरोध प्रदर्शन में डॉ. दिव्या चौबे, डॉ. सुप्रिया अम्बर, डॉ. श्वेता तिवारी, डॉ. समिति शास्त्री, प्रियांशी कौरव, संजय पाटकर सहित अनेक शोधार्थी, स्वर्ण पदकधारी एवं अन्य विद्यार्थी उपस्थित रहे। पूरे घटनाक्रम के दौरान सभी स्कॉलर्स एकजुट दिखाई दिए और उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी व्यक्तिगत सम्मान का नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के प्रत्येक मेधावी विद्यार्थी के समान अधिकार और सम्मान का प्रश्न है

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